क्या रक्षक ही बने भक्षक.? 100 किलो के जंगली सूअर प्रकरण पर गंभीर सवाल..? रायगढ़ वन मंडल में अनिवार्य प्रक्रिया हुई हवा हवाई..पढ़िए हमारी ख़ास रिपोर्ट – रायगढ़ वनविभाग का जंगल राज…

⭕️अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ…
⭕️उच्च मुख्यालय को सूचना नहीं दी गई…
⭕️घायल वन्यजीव के संरक्षण/उपचार का कोई रिकॉर्ड नहीं…
⭕️शव क्षरण की स्थिति पर खड़े हुए सवाल…

रायगढ़। वन परिक्षेत्राधिकारी कार्यालय रायगढ़ (छत्तीसगढ़) से जारी एक आधिकारिक पत्र में 12 फरवरी 2025 को घायल हुए एक जंगली नर सूअर के शव परीक्षण (PM) कर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन इस पूरे प्रकरण ने वन विभाग की कार्यप्रणाली, जवाबदेही और पारदर्शिता पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पत्र के अनुसार, 12 फरवरी 2025 को कक्ष क्रमांक 928 आर.एफ. जुनवानी बंगुरसिया मार्ग पर एक जंगली सूअर दो अज्ञात व्यक्तियों को घायल करते हुए स्वयं भी किसी अज्ञात वाहन से टकराकर घायल हो गया था। बाद में उसकी मृत्यु हो गई। पत्र में संबंधित पशु चिकित्सकों से मृत जंगली सूअर के शव परीक्षण की रिपोर्ट मांगी गई है।
हालांकि इस मामले में सबसे बड़ी बात यह सामने आई है कि अनिवार्य प्रक्रिया ‘पी.ओ.आर. ही दर्ज नहीं की गई, जबकि वन्यजीव से जुड़े ऐसे मामलों में यह प्रक्रिया अनिवार्य मानी जाती है। पीओआर के माध्यम से ही वन्यजीव विभाग के मुख्यालय को सूचना प्रेषित की जाती है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया, जिससे यह प्रतीत होता है कि उच्च स्तर पर भी सूचना नहीं पहुंचाई गई।
पीएम रिपोर्ट में कई विरोधाभास..
शव परीक्षण रिपोर्ट में जंगली नर सूअर का वजन लगभग 100 किलोग्राम बताया गया है तथा उसकी मृत्यु तिथि 15 फरवरी 2025 अंकित की गई है। जबकि घटना 12 फरवरी को हुई थी। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि 12 फरवरी से 15 फरवरी तक घायल सूअर कहां रखा गया था?
क्या उसका उपचार किया जा रहा था?
या वह तीन दिनों तक घायल अवस्था में ही पड़ा रहा?
इस संबंध में किसी भी दस्तावेज या पत्राचार में कोई उल्लेख नहीं मिलता।
और भी चौंकाने वाली बात यह है कि पीएम रिपोर्ट में मृत शरीर के क्षरण (decomposition) का उल्लेख किया गया है। इससे यह आशंका गहराती है कि कहीं घायल वन्यजीव को समय पर संरक्षण या उपचार नहीं मिला। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या रक्षक ही भक्षक बन बैठे थे?
वन भूमि अतिक्रमण और पेड़ कटाई मामलों पर भी सवाल…
यह मामला केवल एक वन्यजीव तक सीमित नहीं है। रायगढ़ वन मंडल में वन भूमि अतिक्रमण के मामलों में पीओआर दर्ज होने के बावजूद कार्रवाई नहीं होने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। इसके अलावा, पेड़ कटाई के सैकड़ों प्रकरण ‘अज्ञात आरोपियों’ के खिलाफ दर्ज कर दिए जाते हैं, जिससे यह संदेह गहराता है कि कहीं विभागीय कर्मचारियों और लकड़ी तस्करों के बीच मिलीभगत तो नहीं है।
यह मामला केवल एक वन्यजीव की मृत्यु उपरांत कार्रवाई का नहीं, बल्कि वन विभाग की कार्यप्रणाली, जवाबदेही और विश्वसनीयता का बन गया है। यदि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की जाए तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि यह लापरवाही थी या किसी गंभीर तथ्य को छिपाने का प्रयास..!



