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कोन्दा भैरा के गोठ – सुशील भोले

चल बजार डहार नइ जावस जी भैरा.. देवरिहा दीया बाती के लेन-देन करे बर?
-मैं तो हमरे गाँव म बिसा डारथौं जी कोंदा.. कुम्हार पारा जाथौं अउ जतका लागथे बिसा लाथौं. फेर हमर इहाँ तो तेरस ले सुरहुत्ती तक के नेंग वाले दीया मनला नवा चॉंउर पिसान के बनाथन. तब एती-तेती कहाँ भटकबे?
-वाह भई.. फेर बजार म तो रंग-रंग फैशन वाला आथें जी संगी.. बने छाॅंट के सुघ्घर असन जिनिस ले म निक लागथे.. चीन-ऊन जइसन आने देश ले घलो आथें कहिथें. आज के लइका मन उही मन ला भाथें.
-मोला अपन देश-राज म बने जिनिस ही सुहाथे जी संगी.. हमरे तीर-तखार के लोगन दू पइसा कमावय बपरा मन.. कहाँ परदेशी मन के मोह म परबे? अउ ऐशन-फैशन वाले दीया-बाती चाही, त आजकाल महिला समूह वाली माईलोगिन मन एक ले बढ़ के एक गोबर के मयारुक दीया बनावत हें, एकर मन जगा बिसा लेना.. कहाँ आने देश वाले मन जगा पइसा डारे बर जाबे.

मुख्य संपादक यशवंत खेडुलकर

सह सम्पादक शैलेन्द्र चिटनवीस जशपुर जिला

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