खेल जगत

अर्जेटीना-3, इजिप्ट 2 : पुनरावलोकन
आलेख : बादल सरोज

7 जुलाई की रात का मैच इस फीफा मुकाबले का सबसे कठिन और अब तक का सबसे रोमांचक मैच था। हम जैसे टीम विशेष के पक्षधर पूर्वाग्रहियों के लिए तो यह सचमुच में क़त्ल की रात जैसी थी। मैच के 79वें मिनट तक मौजूदा विश्व चैंपियन अर्जेंटीना का पहली बार नॉकआउट मुकाबला खेल रही टीम इजिप्ट से 2-0 से पिछड़ने, इजिप्ट की लौह सुरक्षा दीवार से टकरा-टकरा कर मैसी के बार-बार वापस लौटने के बावजूद आख़िरी 11+2  मिनट में मैच का पूरी तरह बदल जाना सिर्फ फुटबॉल में ही संभव है।

कल के मुकाबले के असली हीरो इजिप्ट के गोलकीपर मुस्तफा शाबेर हैं। उन्होंने न सिर्फ मैसी की पेनल्टी को रोका, बल्कि कम से कम आधा दर्जन ऐसे शॉट्स भी रोके, जिनके गोल में तब्दील होने से वे ही रोक सकते थे। मैसी, जिनकी वजह से पांसा पलटा, उनका नम्बर मुस्तफा के बाद ही आता है। मगर बोनस पॉइंट मिलने के चलते सबसे ऊपर पहुँच जाते हैं इजिप्ट के कप्तान मुहम्मद सालाह, इसलिए कि उन्होंने अत्यंत तनाव और बेतहाशा गर्मागर्मो और अपने हताश कोच होसाम हसन के झुंझलाहट भरे बयानों और रेड कार्ड सम्मत आचरण के बीच भी अपना आपा नहीं खोया। हार के बाद वैसी ही प्रतिक्रिया दी, जैसी एक खिलाड़ी को देनी चाहिए। उनकी प्रतिक्रिया पढ़ने लायक है।

उन्होंने “मैं वापस आऊँगा” के नसीरुद्दीन शाह के अंदाज़ में कहा कि “यह हार बहुत दर्दनाक है, लेकिन मिस्र के फैंस को अपनी इस टीम और अपने सपनों पर भरोसा बनाए रखना चाहिए। हम आगे और मजबूत होकर वापसी करेंगे।” खिलाड़ियों की सराहना करते हुए सालाह बोले कि “मुझे आप सभी पर बेहद गर्व है। मैदान पर जो कुछ भी हुआ, उसके बावजूद आप सबने अंत तक हार नहीं मानी। हमने इस टूर्नामेंट में इजिप्ट के फुटबॉल का एक नया इतिहास लिखा है।”    

उनके अलावा यह मुकाबला याद किया जाएगा अर्जेंटीना की वापसी की जिद और मिस्र के रेगिस्तानों से तपकर आई आंधी के बीच आखिर तक जलाकर रखी उम्मीद की लौ के लिए। विश्वविजेता के राउंड ऑफ़ 16 में ही एलिमिनेट हो जाने की सचमुच की आशंका सामने खड़ी थी। इजिप्ट की टीम अपने पिरामिडों की तरह अडिग और एकदम व्यवस्थित खड़ी थी : बॉल के पेनल्टी एरिया में पहुँचने से पहले ही उसके आधा दर्जन — कई बार तो 7-7 खिलाड़ी अभेद्य दीवार बनाकर खड़े हो जाते थे। मैसी की ड्रिबलिंग स्किल और पास देने की महारत के लिए वे इंच भर जमीन नहीं छोड़ते थे। आख़िरी घंटी बजने में  मात्र 11 मिनट शेष हों और स्कोर बोर्ड इजिप्ट 2 – अर्जेंटीना 0 पर अटका हो तो … पसीने सब के छूटते हैं, डर सबको लगता है। मगर डर के आगे जिसे जीत दिखती हो, उसे ही अर्जेंटीना कहते हैं। मैसी की अर्जेंटीना।

79वें मिनट पर मैसी के असिस्ट पर क्रिस्टियन रोमेरो का पहला गोल जैसे ट्रिगर था। चार मिनट बाद 83वें मिनट में खुद मैसी का सीधा फील्ड गोल मुकाबले को बराबरी पर ले आया। खेल के एक्स्ट्रा टाइम में जाने की संभावना बनने लगी, मगर इंजुरी टाइम – खिलाडियों के गिरने उठने में लगे समय – के शुरू में ही 90 + 2 मिनट में मार्तिनेज़ के क्रॉस पर एंजो फ़र्नान्डीज के हैडर ने मिस्र के पिरामिड पर लगा जबर ताला चौपट खोल दिया।

दोनों टीम शानदार खेलीं : इजिप्ट ज्यादा अच्छा खेली। आख़िरी 11 मिनट उनके लिए नहीं थे, तो नहीं थे। जो इसे रिग्ड, पक्षपातपूर्ण फैसलों और रेफरी की अर्जेंटीनापरस्ती का मुकाबला बता रहे हैं, वे फुटबॉल के नियमों के मामले में काफी सदाशयी हैं। नामंजूर किया इजिप्ट का गोल सही था या गलत, पेनल्टी देना या न देना उचित था या अनुचित, यह भावनाओं से नहीं, नियमों और तकनीक से तय होता है। पेनल्टी एरिया में खिलाड़ी के साथ टैक्लिंग और उसे दिया गया चैलेंज यानी धक्कामुक्की पेनल्टी में बदलेगी या नहीं, यह इस बात पर मुनस्सर करता है कि बॉल को पहले किसने छुआ था। डिफेंडर के कब्जे में थी, तो नहीं मिलेगी, आक्रामक खिलाड़ी के पांवों में थी तो बिल्कुल मिलेगी। जिन्हें अब भी संदेह है, वे रीप्ले देख लें।

बेईमानी असंभव नहीं है। खासकर तब जब हजारों – शायद लाखों – करोड़ डॉलर जिस खेल में दांव पर लगे हों, अर्जेंटीना के हारने पर जिसकी व्यूअरशिप धड़ाम से गिर जाने की पक्की गारंटी हो, तब हैण्ड ऑफ़ गॉड की तरह कॉर्पोरेट प्रायोजित स्लिप हो सकती है, की जा सकती है। मगर बेईमानी हुई है, इसे सीरियसली मानने वालों से क्षमा, कांस्पीरेसी थ्योरिस्ट्स से सॉरी के साथ यही कहना है कि ऐसा मानकर चलना कुछ ज्यादा ही संदेही होना है।  

एक तो इसलिए कि अब एक अकेला सब पर भारी नहीं होता — यानि अकेले रेफरी के हाथ में सब कुछ नहीं होता। वी ए आर की टीम अलग होती है और इसके रेफरीज — वीडियो असिस्टेंट रेफरीज — अलग होते हैं और कंप्यूटर आधारित तकनीक नापजोख के मामले में  मिलीमीटर तक की शुद्धता जांचने के बाद फैसला देती है।  

दूसरे यह कि मैच रेफरी चम्पत राय के फूफा नहीं हैं। वे विश्व फुटबॉल के सम्मानित रेफरी हैं। फ्रांस्वा लेटेक्सियर (उच्चारण की गफ़लत न हो, इसलिए अंग्रेजी में  François Letexier) दुनिया के सबसे बेहतरीन और हाई-प्रोफाइल फुटबॉल रेफरी में से एक हैं। वह मूल रूप से फ्रांस के रहने वाले हैं। खेल इतिहास और सांख्यिकी का अंतर्राष्ट्रीय महासंघ (आईएफएफएचएस) उन्हें वर्ष 2024 का दुनिया का सर्वश्रेष्ठ पुरुष रेफरी घोषित कर चुका है। दोहराना जरूरी है कि फ्रांस्वा लेटेक्सियर फ्रांस के है, वही फ्रांस जिसे फाइनल में पेनाल्टी शूट में हराकर 2022 में अर्जेंटीना ने खिताब जीता था। घुटना मुड़ता तो पीठ की तरफ नहीं पेट की तरफ मुड़ता। इसके बाद भी यदि बंदे ने बेईमानी की है, तो फिर तो अब फुटबॉल को रामई राक्खे!!

*और अंत में* : इस मुकाबले ने बता दिया मैसी गॉड, ईश्वर या खुदा नहीं है, ह्यूमन है। हाड़-मांस से बना बंदा है। पेनल्टी मिस करता है, हॉफ टाइम तक 2-0 से पिछड़ने के बाद फीनिक्स की तरह दोबारा झपटता है और फाइनली जीतता है। जीतने के बाद रोता है। पेनल्टी चूकने पर नहीं रोता, जीतने पर रोता है। उसके होते हुए भी अर्जेंटीना हार की कगार पर पहुंच सकती है और उसके रहते जीत भी सकती है ।

*(लेखक लोकजतन के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)*
     

मुख्य संपादक यशवंत खेडुलकर

सह सम्पादक शैलेन्द्र चिटनवीस जशपुर जिला

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