सत्ता से हैं बाहर तो धुआँ ज़हर नज़र आया – जब मिली थी कुर्सी तो वही धुआँ बनकर इत्र था छाया …सत्ता में खामोशी, विपक्ष में जनहित — साधे जाते हैं स्वहित…राजनीति की बिसात पर मोहरा बनती जनता… विलुप्त होते लोकहित..

सन्दर्भ :- बढ़ते प्रदूषण के खिलाफ युवा कांग्रेस का प्रदर्शन
उद्योगों के लगातार विस्तार पर रोक लगाने की मांग, राष्ट्रपति और सीजेआई के नाम कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन..
जब छत्तीसगढ़ में भाजपा सत्ता से बाहर हुई थी, तब इसके द्वारा प्रदूषण, औद्योगिक ज़हर, और नशाखोरी जैसे मुद्दों पर ज़ोरदार आंदोलन किए गए। सड़कों पर धरने हुए, ज्ञापन सौंपे गए, मंचों से जनता को भरोसा दिलाया गया कि सत्ता में आते ही हालात बदलेंगे। वहीं कांग्रेस भी 2018 के पूर्व विपक्ष में रहते हुए इन्हीं मुद्दों को हथियार बनाकर सत्ता पक्ष पर तीखे हमले करती रही थी जोकि अब पुनः विपक्ष में आते ही शुरू हो गई है। सवाल यही है कि सत्ता बदलते ही आन्दोलन/ज्ञापन की तस्वीर वही की वही क्यों रह जाती है?
रायगढ़ एक बार फिर खुद से यही सवाल पूछ रहा है कि
क्या जनहित सिर्फ़ विपक्ष में रहते ही नज़र आता है?
क्या आज रायगढ़ का पर्यावरण पहले से ज़्यादा दबाव या खतरे में है?पहले नहीं था ??जब आप सत्ता में थे तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कितने ठोस कदम उठाए गए? य़ह भी रायगढ़ नहीं भूल सकता कि अडानी को हसदेव,तमनार के जंगलों को उजाड़ने की अनुमति देने के लिए फाइल किसके कार्यकाल में आगे बढ़ाई गई थी। कमोबेश चरित्र भाजपा का भी है आज सत्ता में लौटने के बाद उद्योगों से निकलता प्रदूषण, अपराध, बढ़ती नशाखोरी, और युवाओं का भविष्य—सब कुछ भुला दिया गया है। जनप्रतिनिधियों की वह मुखरता,जनता के प्रति जवाबदेही जो सत्ता से बाहर रहते हुए दिखती थी सत्ता मिलने के बाद विलुप्तप्राय हो गई है।
यह कैसा राजनीतिक चरित्र है जो
जनहित के मुद्दे को सिर्फ़ सत्ता की सीढ़ी समझता है ।
रायगढ़ की जनता अब दोनों ही दलों के चाल और चरित्र को अच्छी तरह समझ चुकी है जनता यह समझ चुकी है कि सरकार किसी की भी हो, अगर दबाव नहीं बनेगा तो व्यवस्था नहीं बदलेगी।
अब ज़रूरत है कि रायगढ़ का हर नागरिक पूछे हम कब तक छले जाते रहेंगे?
यह लड़ाई किसी अकेली पार्टी की सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ़ नहीं होनी चाहिए बल्कि इस लड़ाई को व्यापक और सर्वदलीय बनाकर जनहित को राजनीति से ऊपर रख कर लड़ना चाहिए।
✍️यशवंत खेडुलकर




