जीत उन्हीं की होती है जो अपने काम को पूरा करने में अपने तन-मन को लगा देते हैं..मुनि श्री भावसागर जी महाराज..

प्रथम बार मंगल प्रवेश हुआ
700 किलोमीटर की पदयात्रा हो चुकी है
जशपुर नगर। 13 दिसंबर
महासमाधि धारक परम पूज्य
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षित एवं परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य मुनि श्री धर्म सागर जी महाराज
मुनि श्री भाव सागर जी महाराज के सानिध्य में अहिंसा रक्षा पद यात्रा चल रही है , इसके अंतर्गत 13दिसंबर2025 को मंगल प्रवेश श्री दिगंबर जैनमंदिर कुनकुरी जिला जशपुर छत्तीसगढ़ में हुआ जगह-जगह पाद प्रक्षालान किया गया आरतीउतारी गई ,कुनकुरी जैन समाज के लोग शामिल हुए,
मुनि संघ के पद बिहार में भारत कई नगरो के महानुभाव शामिल हुए,
इस अवसर पर सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री भावसागर जी महाराज ने कहा किप्रयासों के पश्चात् इच्छित फल प्राप्त न होने पर ऐसा महसूस होता है। कि हम हार गये हैं और हम अपने धैर्य को खो देते हैं, गमों को आमंत्रित कर लेते हैं। हार के बहाने ढूँढने लग जाते हैं निराश होकर अपनी हार लिए दूसरों को दोष देना शुरू कर देते हैं आगे कार्य करने में उत्साहहीनता आ जाती है।
हार में टीका-टिप्पणी भी होना स्वाभाविक है लेकिन टीका-टिप्पणी की परवाह किए बगैर जो टिके रहते हैं, अपने काम में लगे रहते हैं, उनके लिये यही तो है जीत वाली बात ।
हार-जीत का खेल, दिलो-दिमाग और तन्मयता का खेल है। जीत और हार में ज्यादा अन्तर नहीं होता, सिर्फ एक कदम का अन्तर होता है। एक कदम आगे चलने वाला जीत जाता है। इसका मतलब ये नहीं कि एक कदम पीछे रहने वाला हार गया है। बल्कि इसका मतलब केवल इतना है कि अभी एक कदम और चलने को रह गया है।
कामयाबी का ताल्लुक उत्साह से है जीत उन्हीं की होती है जो अपने काम को पूरा करने में अपने तन-मन को लगा देते हैं और आखिरी क्षणों तक हार नहीं मानते। हारने पर बहानेबाजी ढूंढ कर अपनी ऊर्जा बरबाद नहीं करते। जीतने के लिये नये तरीके खोजते हैं। वह जानते हैं हार का मतलब, सब कुछ समाप्त नहीं बल्कि सब कुछ फिर से शुरू करना है।हारने वाले आँखों में आँसू नहीं भरते क्योंकि ये जानते हैं कि भरी हुई आँखों से साफ दिखाई नहीं देता, हार के बारे में सोचेंगे तो जीत साफ दिखाई नहीं देगी।
जो लोग हार में विश्वास कर लेते हैं, उनकी प्रगति रुक जाती है। हार न मानने में विश्वास रखने वाले हार को हराने में लगातार लगे रहते हैं और अन्त में जीत ही जाते हैं। वो हार से सीखते हैं, हार को हावी नहीं होने देते। वे जानते हैं कि सफलता संयोग से नहीं, समर्पण से मिलती है और ये भी जानते हैं कि हार सफल होने तक लुका-छिपी का खेल खेलेगी। हार न मानने वाले लोग कई बार बाधाओं से घिर जाते हैं लेकिन वो अपने निर्धारित कार्य को उत्साह के साथ उत्कृष्ट बनाने में लगे रहते हैं। अपनी प्रगति का विश्लेषण कर अपना कार्य खुद करते हैं।
सफलता तय है यदि हम अपनी प्रगति का विश्लेषण स्वयं करें और अपनी लड़ाई खुद लड़ें। जीत पर हमारा कोई नियन्त्रण तो नहीं है. लेकिन हमारा नियन्त्रण केवल इस बात पर हो सकता है कि हम प्रयास करते रहें और इस बात को भी ठीक तरह समझ लें कि मानसिक विकारों को निकाले बगैर सफलता प्राप्त नहीं होगी।
हार के लिये न तो किसी को दोष दें, न निराश हों बल्कि व्यक्ति से सफलता के मन्त्र सीखें। सफलता के लिये तन और मन को समझाने की नहीं जगाने की जरूरत है। जीतने वाले के समय-प्रबन्धन समझने की जरूरत है।हार तो हमें ये सिखाती है कि अगली बार क्या न किया जाये ? नाकामयाबी को बाधा नहीं बनने देना है कामयाबी का राज तो काम को समझने, याद रखने और हाथ आये काम को बेहतर तरीके से करने में छुपा है अतः पहल करें, पहले करें, आप पायेंगे कि उत्साह, साहस तो छूत के रोग जैसा है जब एक व्यक्ति उत्साह और साहस के साथ खड़ा होता है तो उसके पीछे लाइन लग जाती है।
आप कुछ भी कर सकते हैं, बस करना शुरू कर दीजिये गति है जीवन है, लाखों बाधाओं के बावजूद चलना है। उम्मीद पर दुनिया चलती है, जिन्हें दौड़ना है वे कोशिश करते हैं।
आप हार को हरा दें, इसके पहले कि हार आपको हरा दे संसार से अपना हक न माँगें, उसे हासिल करके रहें। इस प्रकार से आप सर्वश्रेष्ठ बन सकते है




