संपादकीय

जनता के धैर्य की एक और अग्नि परीक्षा: बढ़ती एलपीजी-एलएनजी कीमतें और नीतिगत सवाल – निम्न आय वर्ग के मध्यमवर्गीय परिवार फिर होंगे बेहाल..!

सरकारी दावों के विपरीत ईरान युद्ध के एक हफ्ते के भीतर कीमतों में वृद्धि…

संकट काल में सांसदों विधायकों सहित जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं पर भी उठते सवाल..

जीएसटी,कमीशन में कटौती क्यों नहीं…?


देश में एलपीजी (रसोई गैस) और एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) की बढ़ती कीमतों ने एक बार फिर आम नागरिकों, विशेषकर मध्यमवर्गीय परिवारों की आर्थिक चिंताओं को बढ़ा दिया है।ईरान इस्राइल अमेरिका युद्ध से मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव को इन कीमतों में वृद्धि का कारण बताया जा रहा है, लेकिन इसके साथ-साथ केंद्र सरकार की आर्थिक और ऊर्जा नीतियों पर भी गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। विपक्ष सहित कई विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति केवल हालिया ईरान युद्ध का परिणाम नहीं है, बल्कि  पिछले 12 वर्षों में मोदी सरकार द्वारा अपनाई गई नीतियों और आर्थिक प्रयोगों का भी प्रभाव है।
सरकारी दावों के विरुद्ध ईरान युद्ध के एक हफ्ते के भीतर कीमतों में वृद्धि
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल और बड़ी मात्रा में गैस आयात करता है। एलपीजी की खपत भी लगातार बढ़ी है और इसमें से 60 प्रतिशत से अधिक गैस विदेशों से आयात करनी पड़ती है। ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में थोड़ी भी अस्थिरता होने पर घरेलू कीमतों में वृद्धि होना लगभग तय होता है। लेकिन प्रश्न य़ह उठता है कि  सरकारी दावों के अनुसार रिज़र्व स्टॉक 25 दिनों का था तो दामों में वृद्धि अभी से क्यों?
आलोचकों का कहना है कि यदि ऊर्जा क्षेत्र में दीर्घकालिक रणनीति और आत्मनिर्भरता की दिशा में अधिक ठोस कदम उठाए जाते, तो वैश्विक संकटों का असर आम उपभोक्ताओं पर इतना अधिक नहीं पड़ता।
महंगाई के बीच पुराने आर्थिक प्रयोगों की याद..
एलपीजी और एलएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी के बीच आम जनता को पिछले वर्षों के कई बड़े आर्थिक निर्णयों की भी याद आने लगी है।
नोटबंदी (2016) को काले धन और नकली मुद्रा पर रोक लगाने के उद्देश्य से लागू किया गया था। लेकिन इस फैसले के बाद लंबे समय तक देश की अर्थव्यवस्था, छोटे व्यापार और असंगठित क्षेत्र पर उसका असर दिखाई दिया। कई छोटे व्यवसायों और मजदूरों को गंभीर आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
इसके बाद वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू किया गया कालांतर में तथाकथित आंशिक कटौती भी राहत के रूप में प्रचारित की गयी।
इसी तरह कोविड-19 महामारी के दौरान अचानक लागू किया गया देशव्यापी लॉकडाउन भी करोड़ों मजदूरों, छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्ग के लिए भारी आर्थिक संकट लेकर आया।  कई छोटे उद्योग और व्यवसाय उस दौर के झटके से आज भी पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं। ऐसे बड़े आर्थिक प्रयोगों का सबसे अधिक असर आम नागरिकों और मध्यम वर्ग पर ही पड़ा है।
जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं पर भी उठते सवाल
जब आम जनता महंगाई और बढ़ती ऊर्जा कीमतों का सामना कर रही हो, तब यह सवाल भी उठता है कि क्या सरकार को अपने खर्चों की प्राथमिकताओं की समीक्षा नहीं करनी चाहिए। सांसदों और विधायकों को मिलने वाले वेतन, भत्ते, आवास, यात्रा और अन्य सुविधाओं को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है लेकिन इस मुद्दे पर कमोबेश सभी राजनीतिक दलों  का स्वार्थ आड़े आ जाता है और जनता के हिस्से करों का बोझ। होना तो यह चाहिए कि आर्थिक कठिनाई के समय जनप्रतिनिधियों को भी अपनी सुविधाओं में आंशिक कटौती जैसे प्रतीकात्मक कदम उठाने चाहिए। इससे भले ही सरकारी खर्च में बहुत बड़ी बचत न हो, लेकिन जनता के बीच यह संदेश जाता है कि नेतृत्व भी संकट के समय जिम्मेदारी साझा कर रहा है।
एलपीजी और एलएनजी की बढ़ती कीमतें आज केवल आर्थिक मुद्दा नहीं रह गई हैं, बल्कि यह शासन, नीति-निर्माण और आर्थिक प्राथमिकताओं की भी परीक्षा बन गई हैं। नोटबंदी, जीएसटी और कोरोना लॉकडाउन जैसे बड़े आर्थिक निर्णयों की ठोकरों के बाद पहले से ही दबाव झेल रही आम जनता के समक्ष बढ़ती गैस कीमतें धैर्य की एक और अग्नि परीक्षा बनती दिखाई दे रही हैं।

✍️यशवंत खेडुलकर

मुख्य संपादक यशवंत खेडुलकर

सह सम्पादक शैलेन्द्र चिटनवीस जशपुर जिला

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