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कोन्दा भैरा के गोठ – सुशील भोले

जेठौनी जोहार जी भैरा.
-जोहार जी कोंदा.. यहा काला-काला धर के जावत हस जी संगी?
-या.. ए सब टूटहा चरिहा, झेंझरी, सूपा-उपा मन ताय गा.. आज ले हमन इही सब जुन्ना जिनिस मनला बार के भुर्री तापे के नेंग करथन नहीं गा.. ओकरे जोखा तो आय.
-अच्छा.. जेठौनी के रतिहा तुलसी महारानी के पूजा पाठ करे के पाछू कुसियार चुहकत भुर्री तापथन तेकरे नेंग खातिर?
-हहो संगी.. पुरखा मन के चलाय नेंग ताय गा.. रतिहा बेरा अब जुड़ जनाय के चालू तो होइच गे हे, आज भुर्री तापे के शुरुआत करबो तहाँ ले गोरसी अउ भुर्रीच ह तो हमर असन सियनहा मन के चार महीना के संगवारी बन जाथे.
-सही आय संगी.. पहिली असन अब गहिर जाड़ तो नइ जनावय, तभो ले पुरखा मन के चलाय परंपरा ल निभा लेथन.

मुख्य संपादक यशवंत खेडुलकर

सह सम्पादक शैलेन्द्र चिटनवीस जशपुर जिला

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