‘वोट चोरी’ से कांग्रेस के लिए बिहार में सत्ता का ताला खोलने निकले हैं राहुल

दिल्ली. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और रायबरेली से सांसद राहुल गांधी के तेवर इस समय हाई हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली थोड़ी सी संजीवनी ने उनके जीवन में जो उम्मीद की किरण जगाई है,उसका असर उनकी बॉडी लैंग्वेज में साफ दिख रहा है। वो अलग बात है कि 2024 के आम चुनाव के बाद हरियाणा,जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र और दिल्ली में हुए चुनावों में उनकी पार्टी के हाथ कुछ नहीं आया पर जोश पूरा हाई है। इस समय चुनाव आयोग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘वोट चोर’ घोषित कर चुके हैं। संसद परिसर में इसपर विरोध और बिहार में वोटर अधिकार रैली कर रही कांग्रेस ‘वोट चोर,गद्दी छोड़’ का नारा लगा रही है। वोटर अधिकारी रैली की शुरुआत बिहार से करने का सीधा मतलब वहां होने वाले विधानसभा चुनाव से है। राहुल और उनकी कांग्रेस के लिए अब बिहार ही अगला लक्ष्य है जहां उसका सियासी वजूद महज 19 सीटों तक ही सिमटा हुआ है। ऐसे में वोट चोरी की चाबी से कांग्रेस के लिए बिहार की सत्ता का ताला खोलने का सपना देख रहे राहुल के लिए क्या सब विन-विन है या कुछ और। आज हम इसपर विस्तार से बात करेंगे
10 दिनों से ज्यादा का समय हो गया होगा राहुल गांधी को बिहार में रैली करते हुए। वोट चोरी के मुद्दे पर चुनाव आयोग को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कटघरे में खड़ा करने के बाद अब राहुल बिहार के अलग अलग जिलों में जाकर वहां की जनता के कान में यह बात डाल रहे हैं कि इस देश के पीएम ने वोट चोरी के दम पर 2024 की सत्ता हासिल की। 2024 ही नहीं वो तो 2014,2019, के लोकसभा चुनाव की जीत को वोट चोरी बता रहे हैं। राहुल के हिसाब से देखें तो मोदी और उनकी सरकार वोट चोरी कर रही है, पिछले 11 सालों से। इसमें खास बात यह है कि 2014 तक आपकी केंद्र में सरकार थी,सारा तंत्र आपका था फिर भी वोट चोरी हो गई? इस सवाल का उत्तर राहुल जी से भी पूछा जाना चाहिए।
खैर, कांग्रेस का मानना है कि राहुल गांधी के साथ इस वक्त पूरी जनता है और इस बार सबने मान लिया है कि हां वोट चोरी हुई है। राहुल कह रहे हैं कि 6 साल का बच्चा भी ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ का नारा उनके कान में कहकर जा रहा है। हालांकि ये बात जितनी हास्यास्पद है उतनी ही बचकानी भी। खैर, राहुल गांधी की 1,300 किलोमीटर लंबी ‘वोटर अधिकार यात्रा’ बिहार के 20 जिलों से होकर गुजरी है। जनता उनके साथ है कि नहीं ये भीड़ से तय नहीं होता। 2019 में राहुल गांधी की हर रैली में भीड़ होती थी,लाखों की संख्या में लोग आते थे,लेकिन नतीजा उससे उलट आया। मोदी सरकार ने बंपर जीत के साथ देश की सत्ता फिर संभाल ली और राहुल-उनकी पार्टी और नीचे चले गए। तो भीड़ देखकर जीत का अनुमान लगाना तो गलत है,चुनाव के नतीजे ही बता पाएंगे।
‘वोटर अधिकार यात्रा’ को पिछले अभियानों से अलग करने वाली बात यह है कि इसका फोकस एक ऐसे डर पर है जो तुरंत और सीधा महसूस होता है। वोट देने का अधिकार खोना, बेरोजगारी या भ्रष्टाचार, जो बिहार की राजनीति में लंबे समय से सामान्य माने जाते हैं, उनके उलट मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का खतरा नया, जरूरी और व्यक्तिगत है।

बिहार में लंबे समय से हाशिए पर रही कांग्रेस के लिए यह यात्रा फिर से अपनी प्रासंगिकता या कहें कि खुद के वजूद को फिर से जनता के सामने लाने का एक मौका है। आरजेडी (RJD) और वामपंथी दलों के संगठनात्मक ताकत पर सवार होकर, कांग्रेस खुद को एक बार फिर एक ऐसी राष्ट्रीय पार्टी के रूप में पेश कर रही है जो स्थानीय मुद्दों के लिए लड़ सकती है। मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े भावनात्मक मुद्दे से कांग्रेस को बिहार की जाति-आधारित राजनीति में एक बाहरी होने की सामान्य आलोचना को दरकिनार करने का मौका मिल रहा है। हालांकि, इस गति का आगे बने रहना को वक्त ही बताएगा। बिहार के मतदाता अपनी व्यावहारिकता और मजबूत राजनीतिक समझ के लिए जाने जाते हैं। भले ही फिलहाल मताधिकार छीनने का डर खबरों में हावी हो, लेकिन इंडिया गठबंधन (INDIA bloc) इसे वोटों में कितना बदल पाएगा, यह उसकी संगठनात्मक क्षमता, बूथ स्तर पर मौजूदगी और चुनाव से पहले लगातार दबाव बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करेगा। बता दें कि कांग्रेस के पास बिहार में कुल 19 विधायक हैं और यह भी किसी से नहीं छिपा है कि 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने ही राजद का नुकसान कराया था।
इतना ही नहीं अगर बीबीसी की एक रिपोर्ट को सही माने तो वोट जनाधिकार यात्रा में यदा कदा ही आरजेडी के झंडे देखने को मिल रहे हैं। कांग्रेस के झंडों और पोस्टरों से जिस तरह वोट अधिकार यात्रा भरी पड़ी है उससे तो यही लगता है कि यह पूरा अभियान कांग्रेस ने मानो हाईजैक कर लिया है। जाहिर है कि इसके चलते अंदर ही अंदर दोनों ही पार्टियों के बीच टसल भी है। कम से कार्यकर्ताओं में तो यही संदेश जा रहा है। इसलिए ही आरजेडी कार्यकर्ता बीच बीच में तेजस्वी यादव के सीएम होने वाले नारे लगाना नहीं भूलते हैं।
बिहार में कौन जीतेगा,किसके पास फिर सत्ता की चाबी होगी, वो वक्त बताएगा पर कांग्रेस की एडवांस तैयारी की भी दाद देनी पड़ेगी। वोट चोरी का मुद्दा ही सही, उसने चुनाव तारीखों के पहले ही बिहार में खूंटा गाड़ लिया है। राहुल गांधी की ताबड़तोड़ रैलियां तो यही बता रही हैं, लेकिन क्या यह संभव है? कांग्रेस ने 70 सीटों पर डेटा एनालिसिस किया, जहां वह बहुत कम मार्जिन से हारी थी। कांग्रेस ने इस बार बिहार में 100 सीटें मांगी है।


एक और खास बात जो इस चुनाव में दिखाई दे रही है, वो ये कि इस बार बिहार में लगता है तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी को कांग्रेस ने ओवर पावर कर लिया है। सनद रहे कि तेजस्वी और राष्ट्रीय जनता दल वोट चोरी के मुद्दे पर चुनाव नहीं लड़ रही है,या कहें बस कांग्रेस के साथ इस मुद्दे पर है क्योंकि गठबंधन है। उसका मुद्दा सीएम नीतीश कुमार के 20 सालों के शासन से उपजे गुस्से से है। जो कमांड और मुद्दे कभी लालू यादव के घर से तय होते थे और कांग्रेस उसपर हामी भरती थी,राहुल के ‘वोट चोरी’ वाले मुद्दे के बाद तो लगता है कि कमांड और कंट्रोल सेंटर कांग्रेस के पास चला गया है। 16 दिन और 1,300 किलोमीटर तक चलने वाली यात्रा सीमांचल, मिथिलांचल, और मगध जैसे क्षेत्रों से गुजर रही है। राहुल जब मोटरसाइकिल पर चलते हैं तो उनका बाइक अवतार रूप चर्चित होता है। जब वो मखाने के खेतों में जाते हैं तो किसानों की चर्चा शुरू हो जाती है। इन सबके बीच में बहुत दूर दूर तक कहीं भी तेजस्वी की चर्चा नहीं हो रही है।





